Tuesday, June 7, 2011

अच्छा कौन..?

भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई लड़ते-लड़ते अन्ना कब नेताओं से लड़ पड़ेंगे ये कहना थोड़ा कठिन होगा.. ये लड़ाई कोई राजनीतिक छींटाकशी नहीं बल्कि अन्ना की तरफ से नेताओं को मिलने वाली हल्की-सी झिड़की है.. यूं तो अन्ना साफ सुथरी छवि वाले हैं.. भ्रटाचार से उनका दूर का भी नाता नहीं.. लेकिन लोगों को भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ने का पाठ पढ़ाते-पढ़ाते अन्ना कब नेताओं को सीख दे डालेंगे इसका भी ठौर नहीं..
सीधे-साधे अन्ना को कभी गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी की खूबियां भा जाती हैं तो कभी गुजरात में भ्रष्टाचार का दर्द उन्हें दुःखी कर जाता है.. अब अन्ना के दुःख और प्रशंसा वाली प्रतिक्रिया में से ये कहना मुश्किल होगा कि अन्ना को मोदी की कौन सी छवि पसंद आई.. उनके विकासपुरुष की छवि या फिर उनके राज्य की भ्रष्टाचार वाली छवि..?
दुःखी अन्ना की प्रशंसा तब्दील हो गई निंदा में.. खैर.. निंदक नियरे राखिए आंगन कुटी छवाए, बिन पानी साबुन बिना निर्मल करे सुहाय.. ये तो देखने वाली ही बात होगी कि मोदी जैसे अन्ना की प्रशंसा पर खुशी से फुले थे अब क्या वो अपने निंदक नियरे रखेंगे..?
मोदी की बात अभी पुरानी भी न पड़ी थी कि.. अबकी बैकफुट की बारी रही कांग्रेस अध्यक्षा सोनिया गांधी की.. अन्ना की मानें तो मनमोहन अच्छे हैं लेकिन उन्हें चलाने वाला रिमोट कंट्रोल अच्छा नहीं है.. अन्ना ने सीधे-सीधे सोनिया का नाम न लेकर अप्रत्यक्ष रुप में इन सब का दोषी सोनिया को बताया है.. वैसे तो सोनिया पहले भी अन्ना के निशाने पर आ चुकी हैं और सोनिया अन्ना की नाराजगी पर अपनी बेगुनाही की दुहाई भी दे चुकी हैं.. लेकिन क्या अन्ना बताएंगे कि प्रधानमंत्री के अपने दूसरे कार्यकाल में अपने भ्रष्ट सहयोगियों से घिरे मनमोहन को पाक-साफ बता रिमोट कंट्रोल यानी सोनिया पर निशाना कितना उचित है..?
राजा का कारनामा मनमोहन देखते रहे चुपचाप लेकिन फिर भी मनमोहन अच्छे हैं.. अंतरिक्ष देवास कांड भी हो चुका.. लेकिन हमारे प्रधानमंत्री उससे भी अनजान ही रहे.. उनकी ही पार्टी के शासन वाले राज्य में आदर्श घोटाला हुआ.. इस पर भी मनमोहन चुप ही रहे.. अब आदर्श का क्या होगा ये तो चल रही जांच ही बताएगी.. अर्थशास्त्री प्रधानमंत्री के देश में जनता महंगाई से परेशान फिर भी.. मनमोहन अच्छे हैं..
रामदेव के अनशन से परेशान सरकार की मंशा अन्ना देख ही चुके हैं.. दिल्ली के रामलीला मैदान में लाखों की संख्या में सोते लोगों के साथ जो हुआ, उससे दु:खी अन्ना फिर से अनशन के मूड में हैं..
पर, अनशन की मंशा क्यों बनी इसकी तह में भी जाना जरुरी है.. दरअसल, प्रशासन और सरकार की इस कार्रवाई ने अन्ना को ये सोचने पर मजबूर किया कि सरकार कहीं उन्हें धोखा तो नहीं दे रही.. सिविल सोसायटी अब ये सोचने को मजबूर है कि जिन बातों पर सरकार से सहमति नहीं बन पा रही है कहीं ये लोकपाल बिल को अधर में लटकाने की सरकारी मुहिम तो नहीं.. नतीजा, बेनतीजा बैठकों से बैठक न करना ही मुनासिब समझा अन्ना ने.. विपक्ष कहता है रामलीला कांड की जिम्मेदारी ले सरकार.. पर, हर बार की तरह क्या इस बार भी चुप रहेंगे मनमोहन..? सबसे बड़ा प्रश्न, क्या अब भी अन्ना कहेंगे मनमोहन अच्छे हैं..
इसमें कोई सेदेह नहीं कि हमारे प्रधानमंत्री बेदाग छवि वाले हैं.. लेकिन क्या उनकी चुप्पी उन गुनहगारों के गुनाहों को ढंक पाएगी जिनका कमान मनमोहन थामे हैं..? मुमकिन है लोकपाल बिल पर सरकार की मंजूरी मनमोहन सरकार की मजबूरी रही हो.. लेकिन क्या घोटालों के कारनामों वाली सरकार के मुखिया अब भी अच्छे हैं..
सरकारी फैसलों में सोनिया का दखल कितना है ये भी समय-समय पर दिख ही पड़ता है.. चाहे पेट्रोल की कीमत बढ़ने पर कीमत कम करने की सलाह हो या फिर राजा पर कड़े फैसले लेने में सरकार को सलाह या आदर्श का दाग धुलने के लिए महाराष्ट्र का मुख्यमंत्री बदलने की सलाह.. सरकार में कांग्रेस अध्यक्षा का दखल और उनका कद दोनों बताता है..
पर जहां पूरी दाल ही काली हो वहां सीधे-सीधे किसी एक को जिम्मेदार ठहराना कितना सही होगा..? जहां आए दिन भ्रष्टाचार की ख़बरें आती रहती हैं.. कांग्रेस ही नहीं हर पार्टी से.. किसको पाक-साफ कहें..? जहां हर पार्टी में होड़ इस बात की ही लगी हो- मुझसे गंदा कौन..? अभी तक के अन्ना के फैसले या फिर उनके बयान भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई के लिए रहें हैं.. हर पार्टी ने अन्ना को हाथों-हाथ लेना चाहा.. कांग्रेस को भी अन्ना का साथ देना ही पड़ा.. भले ही रामदेव मुद्दे पर अन्ना के बयान पर कांग्रेस ने पहली बार अन्ना पर निशाना साधा हो.. कह सकते हैं निशाने पर आई कांग्रेस के सामने इसके सिवा कोई चारा भी न रहा हो.. पर, लगता है अन्ना के बयान और रामदेव कांड ने जरुर कांग्रेस में खलबली मचा दी है.. ये कांग्रेस के सामने यक्ष प्रश्न ही होगा कि.. आखिर अच्छा कौन..?

Sunday, April 17, 2011

पत्रकारिता में मिथक तोड़ती ‘‘ख़बर लहरिया‘‘

वो कमजोर है... नहीं वो रिपोर्टिंग नहीं कर सकती.
.. आपके लिए ये ठीक रहेगा आप डेस्क पर काम कर.
.. अरे मैडम आप कहां घर-बाहर घूमेंगी आपको तो
घर भी संभालना है... आप कहां इस प्रोफेशन में आ
गईं। चौंकिए मत! ये कहानी नहीं है। पत्रकारिता
जगत में महिलाओं की असलियत है। हां, पर इसे
असलियत का चोगा पहनाया भी पत्रकारिता जगत के
ही पत्रकारों ने, जिन्हें यह शक है कि महिलाएं भी
पत्रकारिता जगत में नाम कर सकती हैं।
पत्रकारिता जगत में इस मिथक को तोड़ती दिखती
हैं उत्तर भारत में बंदुलखंड क्षेत्र के दो  जिले बांदा और
चित्रकूट की कुछ मुट्ठी भर ग्रामीण महिलाएं। इन
ग्रामीण महिलाओं ने एक ऐसा अख़बार निकाला है
जिसमें ख़बरें तो जरूर होती हैं लेकिन अख़बार निकालने
की सारी जिम्मेदारी महिलाएं ही निभाती हैं।
किसी भी काम में पुरूषों का योगदान नहीं लिया
जाता। अख़बार का संपादन करना, विज्ञापन लाना,
यहां तक कि प्रेस तक का भी प्रबध् महिलाएं ही करती
हैं यहां तक कि लोगों तक अख़बार पहुंचाने का काम
भी महिलाएं ही करती हैं यानी हॉकर भी महिलाएं ही
होती हैं। पत्रकारिता जगत में मिथक तोड़ती इस नई
लहर का नाम है ‘‘ख़बर लहरिया‘‘।
इस अख़बार में काम करने वाली महिलाएं घर का
काम भी करती हैं और अख़बार की जिम्मेदारी भी
बखूबी निभाती हैं। ज्यादातर महिलाएं गरीब तबके से
आती हैं, जिसमें दलित, कोल और मुस्लिम समुदाय से
आने वाली महिलाएं ज्यादा हैं। अख़बार में काम करने
वाली लगभग सारी महिलाएं कामकाजी हैं। घर के
काम निपटाने के बाद ये अख़बार का काम करती हैं।
रिपोर्टिंग यदि कहीं दूर जाकर करनी हो तो जरूरत
पड़ने पर महिलाओं  को साइकिल भी दी जाती है। यहां
काम करने वाली महिलाएं 18 से 45 वर्ष तक के उम्र
की हैं। बुंदेली भाषा में निकलने वाले इस अख़बार की
खासियत है कि ख़बरों में महिलाओं का दृष्टिकोण
रखने की कोशिश की जाती है।
अख़बार बुंदेलखंड के चित्रकूट और बांदा जिलों से
प्रकाशित होता है। मई, 2002 में पहला चित्रकूट
संस्करण शुरू हुआ इसके बाद अक्टूबर, 2006 में बांदा
से दूसरा संस्करण शुरू हुआ। जल्द ही बिहार के
सीतामढ़ी से तीसरे संस्करण निकलने की संभावना
है। ख़बर लहरिया की 5,000 प्रतियां निकलती हैं जो
ग्रामीण महिला पत्रकारिता की बड़ी मिसाल के तौर पर
400 गांवों में पहुंचती हैं। इस साप्ताहिक अख़बार की
पहंुच 35,000 लोगों तक है  यानी रीडरशिप 25,000 है।
8 पृष्ठ के इस अख़बार में सभी तरह की ख़बरें मिलती
हैं जिसे लिखती भी महिलाएं ही हैं।
पत्रकारिता के क्षेत्र में ‘चमेली देवी जैन‘ पुरस्कार
और वर्ष 2009 का यनूेस्को का ‘किंग सेजांग‘ साक्षरता
पुरस्कार प्राप्त कर चुके इस अख़बार ने पत्रकारिता के
क्षेत्र में महिलाओं को लेकर कई मिथक भी तोड़े और
पत्रकारिता के क्षेत्र में नया कीर्तिमान भी बनाया।
‘‘ख़बर लहरिया‘‘ ने उस नई लहर को हवा दी जहां
महिलाएं अपने अस्तिव के जद्दोजहद करती नहीं
दिखती, वह स्वेक्षा से अपना भविष्य स्वयं संवारने में
सफल है।
एक नजर में ख़बर लहरिया
राष्ट्रीय, अंतर्राष्ट्रीय और क्षेत्रीय ख़बरें
महिला मुद्दे पर पूरा एक पृष्ठ
पंचायती राज व्यवस्था पर पूरा एक पृष्ठ
मनोरंजन की ख़बरें
संपादकीय पृष्ठ जिसका नाम है ‘‘हमार संदेश‘‘

उनकी संतान होने की सजा...


‘‘वो कहां है... आनंद बाबू? कौन... पुष्पा? अरे पगले! तू अब तक नहीं जान पाया उससे तेरा नाता क्या है? वो तेरी मां है।‘‘ यह संवाद है फिल्म ‘अमर प्रेम‘ से। पुष्पा एक वेष्या है। सौतेली मां के सताए नन्हे बच्चे और एक वेष्या के ममता भरे स्नेह की कहानी है फिल्म ‘अमर प्रेम‘। खैर... फिल्म के निर्देषक शक्ति सामंत भी इस वेष्या को वो नाम और सम्मान न दिला सके जो अंततः गुमनामी के अंधेरे में कहीं खो सी जाती हैं।
ये तो थी ‘उनकी‘ कहानी। पर, जो बात गौर करने की है वह है उनके संतानों की दुर्दषा। जिन्हें न चाहते हुए भी उस बात की सजा मिलती है जो उन्होंने की ही नहीं। यहां सजा देने वाला हम-आप जैसे लोगों का समाज है जो ‘उनकी‘ संतानों को अपने समाज में शामिल ही नहीं करना चाहते। रात अंधेरे में इसी समाज के किसी पुरूष की ये संतानें अपने जन्मदाता के समाज द्वारा बहिष्कृत कर दी जाती है।
हालांकि वेष्यावृŸिा में कितनी महिलाएं शामिल हैं इसका कोई निष्चित आंकड़ा उपलब्ध नहीं है। खास कर भारत में जिनकी दषा ज्यादा सोचनीय है, इस संबंध में विषेष आंकड़े नहीं है। महिला एवं बाल कल्याण मंत्रालय के अनुसार 28 लाख महिलाएं वेष्यावृŸिा के पेषे में हैं। जिनमे से 35.47 प्रतिषत महिलाएं 18 वर्ष से कम आयु में ही इस पेषेे में आ जाती हैं। मानवाधिकार संस्था के अनुसार वेष्यावृŸिा में करीब 200 लाख महिलाएं शामिल हैं।
मुंबई एषिया का सबसे बड़ा सेक्स इंडस्ट्री है तो सबसे अच्छे या यूं कहें ‘रंगीन‘ रेड लाइट एरिया वाले जिले कोलकाता के सोनागाछी और लाछीपुर माने जाते हैं। मुंबई का कमाठीपुरा, दिल्ली का जी बी रोड एरिया, ग्वालियर का रेषमपुरा, पुणे का बुधावर पेथ हजारों सेक्स वर्कर्स से गुलजार है। यही नहीं भारत में कुछ ऐसी जगहें भी हैं जो अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर सेक्स टूरिज्म के लिए मषहूर हैं इनमे वाराणसी का दाल मंडी, सहारनपुर का नक्कासा बाज़ार, मुजफ्फरपुर का चतुर्भुज स्थान, इलाहाबाद का मीरगंज और मेरठ का कबाड़ी बाज़ार विषेष रूप से मषहूर हैं।
वेष्यावृŸिा में शामिल महिलाओं के भी कई वर्ग हैं। कुछ सामान्य वर्ग में आती हैं, कुछ गाने वाली होती हैं तो कुछ डांसर होती हैं। मुबई में इन्हें ‘बार डांसर‘ कहा जाता है। कुछ ‘कॉल गर्ल‘ कही जाती हैं तो कुछ धार्मिक वेष्याएं भी होती हैं। धार्मिक वेष्याओं को ‘देवदासी‘ कहा जाता है। महाराष्ट्र और कर्नाटक के बीच का क्षेत्र तो देवदासी बेल्ट ही कहा जाता है।
नैषनल इंस्टीट्यूट ऑफ पब्लिक कोऑपरेषन एंड चाइल्ड डेवलपमेंट ने वैष्याओं के बच्चों पर एक सर्वे किया, जिसका विषय था - रिसर्च एब्सट्रैक्ट्स ऑन चिल्ड्रेन इन नीड ऑफ केयर एंड प्रोटेक्षन, 1998-2009. रिसर्च में आयुसीमा 0-45 साल रखी गई जिसमें ऐसे बच्चों को आधार बनाया गया जो उन वैष्याओं के साथ रह रहे उनके बच्चे थे या वैष्यावृत्ति के कारण छोड़े गए बच्चे। ऐसे जरूरतमंद और असहाय बच्चों के शारीरिक, मानसिक और सामाजिक विकास को आधार बना कर सर्वे किया गया था। सर्वे विजयवाड़ा और आंध्रप्रदेष के दस ष्षहरों से करीब 312 बच्चों पर किया गया था। सर्वे में गौर करने वाली जो बात निकल कर सामने आई वह यह थी कि वैष्याओं के साथ रह रहे उनके बच्चों में ज्यादातर लड़कियां थी और लड़के या तो 6-12 साल के थे या मां से अलग रह रहे थे।
इन बच्चों की सामाजिक हालत यह थी कि ज्यादातर बच्चे या तो बाल श्रमिक के तौर पर काम कर रहे थे या कहीं किसी अनाथाश्रम में रह रहे थे अथवा सड़कों पर भीख मांगने को मजबूर थे। हालांकि आज भी स्थिति में सुधार दिखती नहीं है। सर्वे में यह बात भी दिखी कि मां के साथ रहने वाली ज्यादातर लड़कियां वैष्यावृत्ति के पेषे में ही आने को मजबूर थी। आय का कोई और जरिया भी इनके पास नहीं होता।
क्राई (ब्त्ल्) जैसी संस्थाएं और कुछ एन जी ओ इस दिषा में काम कर रहीं हैं। जो लोगों को ऐसे जरूरतमंद बच्चों को गोद लेने के लिए प्रेरित करती हैं, इन्हें रोजगार के लिए काम सिखाती हैं। कुछ ऐसी संस्थाएं ऐसे बच्चों के षिक्षा के लिए भी काम कर रहीं हैं, उन्हें मुफ्त किताबें देना और उनके पास जाकर उन्हें पढ़ाना, विषेषकर उन गलियों में जाकर बच्चों को पढ़ाने का काम ऐसी कुछ संस्थाएं कर रहीं हैं। उनके लिए स्कूल भी खोले गए हैं।
मीडिया जिसे समाज का आंख कान और नाक कहते हैं उसकी नजर से आज भी यह विषय अछूता ही है। हां फिल्मों में वैष्याओं की समस्याओं और उनके बच्चों की समस्याओं पर जरूर काम हुआ है। पर, प्रिंट मीडिया और टेलीविजन की मीडिया में यदा कदा ही इनकी समस्याओं पर ख़बरें या चर्चा या विमर्ष आ पाती हैं। कितनी अजीब बात है कि समाज से बहिष्कृत ‘उनकी‘ संतानें मीडिया की नजर से भी महरूम हैं। क्या यह ‘उनकी‘ संतान होने की सजा है...?

Saturday, January 22, 2011

लोकसभा चैनल के कार्यक्रम का सच...


यदि किसी चैनल के कार्यक्रम में आप बतौर ऑडिएंस भाग लेने जाएं और अपने आप को अभिव्यक्त भी न कर पाएं... कैसा महसूस करेंगें? बेशक यदि यह किसी सरकारी चैनल के माध्यम से हो तो और भी दुःखद है। आज की पड़ताल कुछ इसी विषय पर है।
    हुआ यूं, मंगलवार, 18 जनवरी को आई आई एम सी हिन्दी पत्रकारिता के छात्र लोकसभा चैनल के कार्यक्रम ‘अस्मिता’ में बतौर ऑडिएंस भाग लेने गए। विषय था ‘नर्सरी में बच्चों के एडमिशन में अभिभावकों को हो रही परेशानी’। जैसा कि आमतौर पर ऐसे कार्यक्रमों में ऑडिएंस अतिथियों से प्रश्न पूछने के लिए स्वतंत्र होते हैं किंतु लोकसभा चैनल में ऑडिएंस द्वारा पूछे जाने वाले प्रश्न भी पहले से नियोजित थे। कार्यक्रम में भाग लेने से पहले प्रत्येक छात्र को एक पर्ची पर क्या प्रश्न पूछना है यह लिखकर दे दिया गया। उपस्थित छात्रों में इस बात का रोष था कि वे स्वयं को अभिव्यक्त नहीं कर पाए। छात्रों की प्रतिक्रिया यहां तक थी कि अब वे लोकसभा के चर्चा पर आधारित कार्यक्रम में भाग लेने नहीं जाएंगे।

    हालांकि कार्यक्रम में भाग लेने आए अतिथियों ने काफी हद तक विषय से संबंधित प्रश्नों का समाधान किया और विषय की गंभीरता बनाए रखी। अतिथियों में सुमित वोहरा जो एन जी ओ चलाते हैं और बच्चों के एडमिशन में अभिभावकों की समस्या को उठाते हैं, सचिन जी सामाजिक मुद्दे पर अपनी बात रखते हैं, राजशेखर व्यास दूरदर्शन के अधिकारी रह चुके है और अशोक अग्रवाल जाने माने वकील हैं। कार्यक्रम की संचालिका समीना सिद्दीकी ने भी कार्यक्रम को रूचिकर बनाए रखा। कार्यक्रम में बच्चों एवं अभिभावकों समस्या, राइट टू एजुकेशन यानी शिक्षा के अधिकार, सरकार का रूख, शिक्षा की ब्रैंडिंग जैसे मुद्दों पर बात हुई।
    लोकतंत्र की आस्था का केंद्र रही मीडिया स्वयं की अभिव्यक्ति का खुला मंच रही है, किंतु यह कहां तक उचित है जहां पत्रकारिता के छात्रों को ही अभिव्यक्ति से महरूम रहना पड़े। लोकसभा चैनल का उदाहरण काफी नहीं है? पड़ताल जारी है...