वो कमजोर है... नहीं वो रिपोर्टिंग नहीं कर सकती... आपके लिए ये ठीक रहेगा आप डेस्क पर काम कर.
.. अरे मैडम आप कहां घर-बाहर घूमेंगी आपको तो
घर भी संभालना है... आप कहां इस प्रोफेशन में आ
गईं। चौंकिए मत! ये कहानी नहीं है। पत्रकारिता
जगत में महिलाओं की असलियत है। हां, पर इसे
असलियत का चोगा पहनाया भी पत्रकारिता जगत के
ही पत्रकारों ने, जिन्हें यह शक है कि महिलाएं भी
पत्रकारिता जगत में नाम कर सकती हैं।
पत्रकारिता जगत में इस मिथक को तोड़ती दिखती
हैं उत्तर भारत में बंदुलखंड क्षेत्र के दो जिले बांदा और
चित्रकूट की कुछ मुट्ठी भर ग्रामीण महिलाएं। इन
ग्रामीण महिलाओं ने एक ऐसा अख़बार निकाला है
जिसमें ख़बरें तो जरूर होती हैं लेकिन अख़बार निकालने
की सारी जिम्मेदारी महिलाएं ही निभाती हैं।
किसी भी काम में पुरूषों का योगदान नहीं लिया
जाता। अख़बार का संपादन करना, विज्ञापन लाना,
यहां तक कि प्रेस तक का भी प्रबध् महिलाएं ही करती
हैं यहां तक कि लोगों तक अख़बार पहुंचाने का काम
भी महिलाएं ही करती हैं यानी हॉकर भी महिलाएं ही
होती हैं। पत्रकारिता जगत में मिथक तोड़ती इस नई
लहर का नाम है ‘‘ख़बर लहरिया‘‘।
इस अख़बार में काम करने वाली महिलाएं घर का
काम भी करती हैं और अख़बार की जिम्मेदारी भी
बखूबी निभाती हैं। ज्यादातर महिलाएं गरीब तबके से
आती हैं, जिसमें दलित, कोल और मुस्लिम समुदाय से
आने वाली महिलाएं ज्यादा हैं। अख़बार में काम करने
वाली लगभग सारी महिलाएं कामकाजी हैं। घर के
काम निपटाने के बाद ये अख़बार का काम करती हैं।
रिपोर्टिंग यदि कहीं दूर जाकर करनी हो तो जरूरत
पड़ने पर महिलाओं को साइकिल भी दी जाती है। यहां
काम करने वाली महिलाएं 18 से 45 वर्ष तक के उम्र
की हैं। बुंदेली भाषा में निकलने वाले इस अख़बार की
खासियत है कि ख़बरों में महिलाओं का दृष्टिकोण
रखने की कोशिश की जाती है।
अख़बार बुंदेलखंड के चित्रकूट और बांदा जिलों से
प्रकाशित होता है। मई, 2002 में पहला चित्रकूट
संस्करण शुरू हुआ इसके बाद अक्टूबर, 2006 में बांदा
से दूसरा संस्करण शुरू हुआ। जल्द ही बिहार के
सीतामढ़ी से तीसरे संस्करण निकलने की संभावना
है। ख़बर लहरिया की 5,000 प्रतियां निकलती हैं जो
ग्रामीण महिला पत्रकारिता की बड़ी मिसाल के तौर पर
400 गांवों में पहुंचती हैं। इस साप्ताहिक अख़बार की
पहंुच 35,000 लोगों तक है यानी रीडरशिप 25,000 है।
8 पृष्ठ के इस अख़बार में सभी तरह की ख़बरें मिलती
हैं जिसे लिखती भी महिलाएं ही हैं।
पत्रकारिता के क्षेत्र में ‘चमेली देवी जैन‘ पुरस्कार
और वर्ष 2009 का यनूेस्को का ‘किंग सेजांग‘ साक्षरता
पुरस्कार प्राप्त कर चुके इस अख़बार ने पत्रकारिता के
क्षेत्र में महिलाओं को लेकर कई मिथक भी तोड़े और
पत्रकारिता के क्षेत्र में नया कीर्तिमान भी बनाया।
‘‘ख़बर लहरिया‘‘ ने उस नई लहर को हवा दी जहां
महिलाएं अपने अस्तिव के जद्दोजहद करती नहीं
दिखती, वह स्वेक्षा से अपना भविष्य स्वयं संवारने में
सफल है।
एक नजर में ख़बर लहरिया
राष्ट्रीय, अंतर्राष्ट्रीय और क्षेत्रीय ख़बरें
महिला मुद्दे पर पूरा एक पृष्ठ
पंचायती राज व्यवस्था पर पूरा एक पृष्ठ
मनोरंजन की ख़बरें
संपादकीय पृष्ठ जिसका नाम है ‘‘हमार संदेश‘‘
