Tuesday, November 20, 2012


छठ पूजा पर खरीदारी के लिये भारी भीड उमडी दिल्ली के बाजारों में
नयी दिल्ली, 17 नवंबर :भाषा: 
पूरे चार दिन तक चलने वाले सूर्य उपासना के महान पर्व छठकी आज नहाय खाय के साथ शुरूआत होने पर आज लाखों की संख्या में छठव्रतियांे ने अपने अपने घरों के पास के बाजारों में जमकर खरीदारी की जिसके चलते दिल्ली और आसपास के क्षेत्रों के बाजारों में जबर्दस्त गहमा गहमी देखी गयी ।
पूरे देश और विदेश में फैले करोडों की संख्या में सूर्य उपासना के इस अनूठे पर्व को हालांकि छठव्रती अपने परिवार की सुख समृद्धि तथा कल्याण की कामना के साथ बडे ही सात्विक भाव से मनाते हैं लेकिन साथ साथ इस पर्व के बहाने बाजार को गुलजार होने का मौका मिल जाता है। इस चार दिवसीय महापर्व की शुरूआत आज 17 नवंबर को नहाय खाय के साथ हो गयी तथा आगामी 20 नवंबर को उगते हुए सूर्य के अघ्र्य के साथ इस पर्व का समापन हो जाएगा।
हालांकि इस पर्व को तो पूरे देश और विदेशों में बसे भारतीयों द्वारा मनाया जाता है लेकिन बिहार, झारखंड और पूर्वी उत्तर प्रदेश में यह पर्व तो विशेष तौर पर मनाया जाता है। दिल्ली में भी इस पर्व को पिछले कई सालों से पूरी र्शद्धा से मनाया जाने लगा है, नतीजतन दिल्ली के बाजारों में भी ‘‘छठ’’ पर्व की रौनक नजर आने लगी है।
‘‘छठ’’ में उपयोग की जाने वाली पूजा सामग्री में बांस की बनी सूप, दौरा, ईख, ‘कोसीकी सामग्री जिसमें मिट्टी के बर्तन, दीए, मिट्टी के हाथी शामिल होते हैं, इनका विशेष महत्व होता है। प्रसाद के रूप में ठेकुआ, कई तरह के फल, अडवी, सूथनी, अदरक सहित अन्य सामग्री चढाया जाता है।
छठ मनाने के लिये दीवाली के बाद से ही बाजारों में रौनक बढ जाती है लेकिन अब दिल्ली में लाखों की संख्या में लोगों द्वारा इस पर्व को मनाये जाने के चलते यहां के भी बाजारों में ये सामग्रियां प्रचुर मात्रा में मिलने लगी हैं हालांकि आज से कुछ वर्षों पहले छठ की सामग्री दिल्ली के दक्षिणी, पश्‍चिमी क्षेत्रों मुश्किल से नजर आती थीं लेकिन अब वही लोगों को आसानी से उपलब्ध हो जा रही हैं।
दिल्ली के पुष्प समिति ओखला मंडी में दुकानदार मोहम्मद इकबाल कुछ सालों से मंडी में ‘‘छठ पूजा’’ की सामग्री बेचते हैं। मूलत: लखनउ के निवासी मोहम्मद इकबाल कहते हैं, ‘‘पहले तो यहां दिल्ली में बहुत कम लोग ‘‘छठ पूजा’’ किया करते थे, ज्यादातर लोग तो अपने राज्य जाना ही पसंद करते थे लेकिन अब यहां भी छठ पूजा करने वालों की संख्या बढ रही है। हालांकि मैं यहां कई सालों से छठ पूजा की सामग्री बेचता हूं और अब धीरे धीरे लोगों की संख्या बढने पर बाजार को भी फायदा हो रहा है। आज से यहां छठ पूजा के लिए बाजार भी शुरू हो गया है।’’ उन्होंने कहा, ‘‘दिल्ली के हर इलाके से लोग यहां पूजा की सामग्री खरीदने आते हैं। यहां आपको पूजा के लिए जरूरी फल, सूप, दौरा, लड्डू पेडा बताशा समेत अन्य मिठाइयां भी आसानी से मिल जाएगी।
बेशक महंगाई का असर हर सामान पर पडा है तब भी र्शद्धालु पूरे जोश खरोश और र्शद्धा के साथ इन सामग्रियों को खरीद कर सूर्य उपासना कर रहे हैं । मंहगाई का आलम यह है कि थोक मंडियों में सेब 60 से 110 रुपए के बीच में, संतरा 42 रुपए, अनार 100 रुपए, नारियल दस से 12 रुपए, सूप 30 से 50 रुपए, दौरा 50 से 150 रुपए, अदरक पांच रुपए में एक मिल रहे हैं। इन सामग्रियों को खुदरा खरीदने पर तो छठव्रतियों को और अधिक पैसे खर्च करने पड रहे हैं लेकिन इसके बावजूद किसी भी र्शद्धालु की र्शद्धा में कोई कमी नहीं देखी जा रही है ।
इसी तरह पूर्वी उत्तरी दिल्ली के वजीराबाद इलाके में भी छठ पूजा की सामग्री के लिए विशेष तौर पर बाजार लगाया जाता है। वजीराबाद इलाके के पास यमुना नदी है इसलिए यहां बडी संख्या में छठव्रती पूजा करने आते हैं।
वजीराबाद के समीप के इलाके में रहने वाली मूलत: बिहार के खगडिया की निवासी अभिलाषा देवी बताती हैं, ‘‘मैं दिल्ली में वैसे तो कई सालों से रह रही हूं लेकिन अब मै पिछले तीन सालों से छठ पूजा कर रही हूं। पहले मैं बिहार में ही इस पर्व को मनाती थी । अब मुझे यहां वजीराबाद के बाजार में पूजा के लिए हर चीज आसानी से मिल जाती है।’’ कई बाजारों में जैसे कि कालकाजी के पास के इलाकों के बाजारों में तो छठ पूजा के लिए फल, पूजा की सामग्री इत्यादि को दौरा में ही पैक करके बेचा जा रहा है। र्शद्धालुओं को अब इससे सुविधा हो गई और उन्हें पूजा की हर सामग्री को अलग अलग खरीदना नहीं पड रहा। 
कालकाजी बाजार के एक दुकानदार ने बताया कि लोगों में इतनी अपार र्शद्धा है कि लोग इस पैक को हाथों हाथ ले रहे हैं। इस तरह के पैक आमतौर पर 1000 रुपए से लेकर 2000 रुपए के बीच मिल रहे हैं।
छठ पर्व के कारण गुलजार बाजारों के दुकानदारों को भी इस महंगाई के दौर में खुशी का एक मौका मिल गया हालांकि आम उपभोक्ता पर महंगाई की मार को साफ तौर पर देखी जा सकती है।

शारदा सिन्हा


खो न जाएं 'छठ पूजा' के मधुर गीत

सुंदर सजे घाटों पर छठव्रतियों की धूम है। पश्चिम में क्षितिज पर डूबते सुनहरे सूरज और फिर उषाकाल में पूर्व से उगते सूर्य को अर्घ्‍य देते छठव्रती पूरे 36 घंटे तक के कठिन व्रत के बावजूद छठी मैया के गीत लगातार गाते रहते हैं। हालांकि छठव्रतियों के इन मधुर गीतों को गाने वालों की संख्या लगातार कम होती जा रही है।

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छठ पूजा' के लोकगीतों की चर्चा होते ही सबसे पहले पद्मश्री से सम्मानित मैथिल कोकिला शारदा सिन्हा का नाम जेहन में आता है। ऐसे कई गीत हैं, जिन्हें बिहार की लोक कलाकार शारदा सिन्हा ने अपनी आवाज दी है। लोकगीतों के अलावा उन्होंने हिंदी फिल्मों में भी गीत गाए हैं।

लोक गायकों की घटती संख्या पर शारदा सिन्हा ने में कहा, यह सही है कि अब गिनती के लोक कलाकर हैं। हमारी संस्कृति की उजली धूप को चमकीला बनाए रखने के लिए ऐसी धुनें बनाने वालों, इन्हें श्रद्धा से गाने वालों और पूरे मन से सुनने वालों की जरूरत है।

उन्होंने कहा, छठ की परंपरा बहुत पुरानी है और इस पर्व को बहुत पवित्रता से मनाया जाता है। इस पर्व के गीतों में भी शुद्धता और सात्विकता की जरूरत है। मैंने देखा है कि आजकल लोग शादी के गीतों या फिल्मी गीतों की धुनों पर 'छठ पूजा' के गीत बना लेते हैं। शायद इसीलिए छठ गीतों की लोकप्रियता कम होती जा रही है।

शारदा कहती हैं, ऐसा नहीं है कि लोक कलाकार नहीं हैं या उनकी प्रतिभा में कमी है, लेकिन यह भी सच है कि लोकगीतों में कमी आई है। लोक कलाकारों के गीतों को सहेजा जाना चाहिए, लेकिन फिलहाल ऐसी कोई व्यवस्था बिहार में नहीं है। बिहार में चूंकि ग्रामीण परिवेश के लोग ज्यादा हैं, इसलिए यहां लोकगीतों की परंपरा रही है, लेकिन अब वह भी धीरे-धीरे लुप्त हो रही है।

लोक कलाकारों को बढ़ावा देने के संबंध में उन्होंने कहा, एक लोक कलाकार होने के नाते लोकगीतों को बढ़ावा देने के लिए मैं बहुत इच्छुक हूं और इसके लिए मैं एक संस्था का निर्माण भी करना चाहती हूं, ताकि लोकगीतों और लोक कलाकारों को बढ़ावा मिल सके। हालांकि अभी यह संस्था मूर्तरूप नहीं ले पाई है, लेकिन इस पर काम जारी है।

शारदा सिन्हा ने मैथिली, भोजपुरी और मगही में भी कई लोकगीत और छठ के गीत गाए हैं। छठ गीतों में अनुराधा पौडवाल, उदित नारायण जैसे गायकों की आवाजें भी सुनाई पड़ती हैं, लेकिन मिट्टी से जुड़े खांटी लोक गायकों की बात करें तो स्थिति बहुत अच्छी नजर नहीं आती।

सूर्य की उपासना का पावन पर्व 'छठ' अपने धार्मिक, पारंपरिक और लोक महत्व के साथ ही लोकगीतों की वजह से भी जाना जाता है। घाटों पर 'छठी मैया की जय, जल्दी-जल्दी उगी हे सूरज देव..', 'कईली बरतिया तोहार हे छठी मैया..' 'दर्शन दीहीं हे आदित देव..', 'कौन दिन उगी छई हे दीनानाथ..' जैसे गीत सुनाई दे रहे हैं।

मंगल गीतों की ध्वनि से वातावरण श्रद्धा और भक्ति से गुंजायमान हो रहा है। सोमवार को संध्या को अस्त होते सूर्य को अर्घ्‍य देने के बाद 20 नवंबर को उगते हुए सूर्य को अर्घ्‍य देते ही इस पर्व का समापन हो जाएगा। (भाषा)