खो न जाएं 'छठ पूजा' के मधुर गीत
सुंदर सजे घाटों पर छठव्रतियों की धूम है। पश्चिम में
क्षितिज पर डूबते सुनहरे सूरज और
फिर उषाकाल में पूर्व से उगते सूर्य को अर्घ्य देते छठव्रती पूरे 36 घंटे तक के कठिन व्रत के
बावजूद छठी मैया के गीत लगातार गाते रहते हैं। हालांकि छठव्रतियों के इन मधुर गीतों को गाने
वालों की संख्या लगातार कम होती जा
रही है।
'छठ पूजा' के लोकगीतों की चर्चा होते ही सबसे पहले पद्मश्री से सम्मानित मैथिल कोकिला शारदा सिन्हा का नाम जेहन में आता है। ऐसे कई गीत हैं, जिन्हें बिहार की लोक कलाकार शारदा सिन्हा ने अपनी आवाज दी है। लोकगीतों के अलावा उन्होंने हिंदी फिल्मों में भी गीत गाए हैं।
लोक गायकों की घटती संख्या पर शारदा सिन्हा ने में कहा, यह सही है कि अब गिनती के लोक कलाकर हैं। हमारी संस्कृति की उजली धूप को चमकीला बनाए रखने के लिए ऐसी धुनें बनाने वालों, इन्हें श्रद्धा से गाने वालों और पूरे मन से सुनने वालों की जरूरत है।
उन्होंने कहा, छठ की परंपरा बहुत पुरानी है और इस पर्व को बहुत पवित्रता से मनाया जाता है। इस पर्व के गीतों में भी शुद्धता और सात्विकता की जरूरत है। मैंने देखा है कि आजकल लोग शादी के गीतों या फिल्मी गीतों की धुनों पर 'छठ पूजा' के गीत बना लेते हैं। शायद इसीलिए छठ गीतों की लोकप्रियता कम होती जा रही है।
शारदा कहती हैं, ऐसा नहीं है कि लोक कलाकार नहीं हैं या उनकी प्रतिभा में कमी है, लेकिन यह भी सच है कि लोकगीतों में कमी आई है। लोक कलाकारों के गीतों को सहेजा जाना चाहिए, लेकिन फिलहाल ऐसी कोई व्यवस्था बिहार में नहीं है। बिहार में चूंकि ग्रामीण परिवेश के लोग ज्यादा हैं, इसलिए यहां लोकगीतों की परंपरा रही है, लेकिन अब वह भी धीरे-धीरे लुप्त हो रही है।
लोक कलाकारों को बढ़ावा देने के संबंध में उन्होंने कहा, एक लोक कलाकार होने के नाते लोकगीतों को बढ़ावा देने के लिए मैं बहुत इच्छुक हूं और इसके लिए मैं एक संस्था का निर्माण भी करना चाहती हूं, ताकि लोकगीतों और लोक कलाकारों को बढ़ावा मिल सके। हालांकि अभी यह संस्था मूर्तरूप नहीं ले पाई है, लेकिन इस पर काम जारी है।
शारदा सिन्हा ने मैथिली, भोजपुरी और मगही में भी कई लोकगीत और छठ के गीत गाए हैं। छठ गीतों में अनुराधा पौडवाल, उदित नारायण जैसे गायकों की आवाजें भी सुनाई पड़ती हैं, लेकिन मिट्टी से जुड़े खांटी लोक गायकों की बात करें तो स्थिति बहुत अच्छी नजर नहीं आती।
सूर्य की उपासना का पावन पर्व 'छठ' अपने धार्मिक, पारंपरिक और लोक महत्व के साथ ही लोकगीतों की वजह से भी जाना जाता है। घाटों पर 'छठी मैया की जय, जल्दी-जल्दी उगी हे सूरज देव..', 'कईली बरतिया तोहार हे छठी मैया..' 'दर्शन दीहीं हे आदित देव..', 'कौन दिन उगी छई हे दीनानाथ..' जैसे गीत सुनाई दे रहे हैं।
मंगल गीतों की ध्वनि से वातावरण श्रद्धा और भक्ति से गुंजायमान हो रहा है। सोमवार को संध्या को अस्त होते सूर्य को अर्घ्य देने के बाद 20 नवंबर को उगते हुए सूर्य को अर्घ्य देते ही इस पर्व का समापन हो जाएगा। (भाषा)
'छठ पूजा' के लोकगीतों की चर्चा होते ही सबसे पहले पद्मश्री से सम्मानित मैथिल कोकिला शारदा सिन्हा का नाम जेहन में आता है। ऐसे कई गीत हैं, जिन्हें बिहार की लोक कलाकार शारदा सिन्हा ने अपनी आवाज दी है। लोकगीतों के अलावा उन्होंने हिंदी फिल्मों में भी गीत गाए हैं।
लोक गायकों की घटती संख्या पर शारदा सिन्हा ने में कहा, यह सही है कि अब गिनती के लोक कलाकर हैं। हमारी संस्कृति की उजली धूप को चमकीला बनाए रखने के लिए ऐसी धुनें बनाने वालों, इन्हें श्रद्धा से गाने वालों और पूरे मन से सुनने वालों की जरूरत है।
उन्होंने कहा, छठ की परंपरा बहुत पुरानी है और इस पर्व को बहुत पवित्रता से मनाया जाता है। इस पर्व के गीतों में भी शुद्धता और सात्विकता की जरूरत है। मैंने देखा है कि आजकल लोग शादी के गीतों या फिल्मी गीतों की धुनों पर 'छठ पूजा' के गीत बना लेते हैं। शायद इसीलिए छठ गीतों की लोकप्रियता कम होती जा रही है।
शारदा कहती हैं, ऐसा नहीं है कि लोक कलाकार नहीं हैं या उनकी प्रतिभा में कमी है, लेकिन यह भी सच है कि लोकगीतों में कमी आई है। लोक कलाकारों के गीतों को सहेजा जाना चाहिए, लेकिन फिलहाल ऐसी कोई व्यवस्था बिहार में नहीं है। बिहार में चूंकि ग्रामीण परिवेश के लोग ज्यादा हैं, इसलिए यहां लोकगीतों की परंपरा रही है, लेकिन अब वह भी धीरे-धीरे लुप्त हो रही है।
लोक कलाकारों को बढ़ावा देने के संबंध में उन्होंने कहा, एक लोक कलाकार होने के नाते लोकगीतों को बढ़ावा देने के लिए मैं बहुत इच्छुक हूं और इसके लिए मैं एक संस्था का निर्माण भी करना चाहती हूं, ताकि लोकगीतों और लोक कलाकारों को बढ़ावा मिल सके। हालांकि अभी यह संस्था मूर्तरूप नहीं ले पाई है, लेकिन इस पर काम जारी है।
शारदा सिन्हा ने मैथिली, भोजपुरी और मगही में भी कई लोकगीत और छठ के गीत गाए हैं। छठ गीतों में अनुराधा पौडवाल, उदित नारायण जैसे गायकों की आवाजें भी सुनाई पड़ती हैं, लेकिन मिट्टी से जुड़े खांटी लोक गायकों की बात करें तो स्थिति बहुत अच्छी नजर नहीं आती।
सूर्य की उपासना का पावन पर्व 'छठ' अपने धार्मिक, पारंपरिक और लोक महत्व के साथ ही लोकगीतों की वजह से भी जाना जाता है। घाटों पर 'छठी मैया की जय, जल्दी-जल्दी उगी हे सूरज देव..', 'कईली बरतिया तोहार हे छठी मैया..' 'दर्शन दीहीं हे आदित देव..', 'कौन दिन उगी छई हे दीनानाथ..' जैसे गीत सुनाई दे रहे हैं।

मंगल गीतों की ध्वनि से वातावरण श्रद्धा और भक्ति से गुंजायमान हो रहा है। सोमवार को संध्या को अस्त होते सूर्य को अर्घ्य देने के बाद 20 नवंबर को उगते हुए सूर्य को अर्घ्य देते ही इस पर्व का समापन हो जाएगा। (भाषा)

No comments:
Post a Comment