Sunday, April 17, 2011

उनकी संतान होने की सजा...


‘‘वो कहां है... आनंद बाबू? कौन... पुष्पा? अरे पगले! तू अब तक नहीं जान पाया उससे तेरा नाता क्या है? वो तेरी मां है।‘‘ यह संवाद है फिल्म ‘अमर प्रेम‘ से। पुष्पा एक वेष्या है। सौतेली मां के सताए नन्हे बच्चे और एक वेष्या के ममता भरे स्नेह की कहानी है फिल्म ‘अमर प्रेम‘। खैर... फिल्म के निर्देषक शक्ति सामंत भी इस वेष्या को वो नाम और सम्मान न दिला सके जो अंततः गुमनामी के अंधेरे में कहीं खो सी जाती हैं।
ये तो थी ‘उनकी‘ कहानी। पर, जो बात गौर करने की है वह है उनके संतानों की दुर्दषा। जिन्हें न चाहते हुए भी उस बात की सजा मिलती है जो उन्होंने की ही नहीं। यहां सजा देने वाला हम-आप जैसे लोगों का समाज है जो ‘उनकी‘ संतानों को अपने समाज में शामिल ही नहीं करना चाहते। रात अंधेरे में इसी समाज के किसी पुरूष की ये संतानें अपने जन्मदाता के समाज द्वारा बहिष्कृत कर दी जाती है।
हालांकि वेष्यावृŸिा में कितनी महिलाएं शामिल हैं इसका कोई निष्चित आंकड़ा उपलब्ध नहीं है। खास कर भारत में जिनकी दषा ज्यादा सोचनीय है, इस संबंध में विषेष आंकड़े नहीं है। महिला एवं बाल कल्याण मंत्रालय के अनुसार 28 लाख महिलाएं वेष्यावृŸिा के पेषे में हैं। जिनमे से 35.47 प्रतिषत महिलाएं 18 वर्ष से कम आयु में ही इस पेषेे में आ जाती हैं। मानवाधिकार संस्था के अनुसार वेष्यावृŸिा में करीब 200 लाख महिलाएं शामिल हैं।
मुंबई एषिया का सबसे बड़ा सेक्स इंडस्ट्री है तो सबसे अच्छे या यूं कहें ‘रंगीन‘ रेड लाइट एरिया वाले जिले कोलकाता के सोनागाछी और लाछीपुर माने जाते हैं। मुंबई का कमाठीपुरा, दिल्ली का जी बी रोड एरिया, ग्वालियर का रेषमपुरा, पुणे का बुधावर पेथ हजारों सेक्स वर्कर्स से गुलजार है। यही नहीं भारत में कुछ ऐसी जगहें भी हैं जो अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर सेक्स टूरिज्म के लिए मषहूर हैं इनमे वाराणसी का दाल मंडी, सहारनपुर का नक्कासा बाज़ार, मुजफ्फरपुर का चतुर्भुज स्थान, इलाहाबाद का मीरगंज और मेरठ का कबाड़ी बाज़ार विषेष रूप से मषहूर हैं।
वेष्यावृŸिा में शामिल महिलाओं के भी कई वर्ग हैं। कुछ सामान्य वर्ग में आती हैं, कुछ गाने वाली होती हैं तो कुछ डांसर होती हैं। मुबई में इन्हें ‘बार डांसर‘ कहा जाता है। कुछ ‘कॉल गर्ल‘ कही जाती हैं तो कुछ धार्मिक वेष्याएं भी होती हैं। धार्मिक वेष्याओं को ‘देवदासी‘ कहा जाता है। महाराष्ट्र और कर्नाटक के बीच का क्षेत्र तो देवदासी बेल्ट ही कहा जाता है।
नैषनल इंस्टीट्यूट ऑफ पब्लिक कोऑपरेषन एंड चाइल्ड डेवलपमेंट ने वैष्याओं के बच्चों पर एक सर्वे किया, जिसका विषय था - रिसर्च एब्सट्रैक्ट्स ऑन चिल्ड्रेन इन नीड ऑफ केयर एंड प्रोटेक्षन, 1998-2009. रिसर्च में आयुसीमा 0-45 साल रखी गई जिसमें ऐसे बच्चों को आधार बनाया गया जो उन वैष्याओं के साथ रह रहे उनके बच्चे थे या वैष्यावृत्ति के कारण छोड़े गए बच्चे। ऐसे जरूरतमंद और असहाय बच्चों के शारीरिक, मानसिक और सामाजिक विकास को आधार बना कर सर्वे किया गया था। सर्वे विजयवाड़ा और आंध्रप्रदेष के दस ष्षहरों से करीब 312 बच्चों पर किया गया था। सर्वे में गौर करने वाली जो बात निकल कर सामने आई वह यह थी कि वैष्याओं के साथ रह रहे उनके बच्चों में ज्यादातर लड़कियां थी और लड़के या तो 6-12 साल के थे या मां से अलग रह रहे थे।
इन बच्चों की सामाजिक हालत यह थी कि ज्यादातर बच्चे या तो बाल श्रमिक के तौर पर काम कर रहे थे या कहीं किसी अनाथाश्रम में रह रहे थे अथवा सड़कों पर भीख मांगने को मजबूर थे। हालांकि आज भी स्थिति में सुधार दिखती नहीं है। सर्वे में यह बात भी दिखी कि मां के साथ रहने वाली ज्यादातर लड़कियां वैष्यावृत्ति के पेषे में ही आने को मजबूर थी। आय का कोई और जरिया भी इनके पास नहीं होता।
क्राई (ब्त्ल्) जैसी संस्थाएं और कुछ एन जी ओ इस दिषा में काम कर रहीं हैं। जो लोगों को ऐसे जरूरतमंद बच्चों को गोद लेने के लिए प्रेरित करती हैं, इन्हें रोजगार के लिए काम सिखाती हैं। कुछ ऐसी संस्थाएं ऐसे बच्चों के षिक्षा के लिए भी काम कर रहीं हैं, उन्हें मुफ्त किताबें देना और उनके पास जाकर उन्हें पढ़ाना, विषेषकर उन गलियों में जाकर बच्चों को पढ़ाने का काम ऐसी कुछ संस्थाएं कर रहीं हैं। उनके लिए स्कूल भी खोले गए हैं।
मीडिया जिसे समाज का आंख कान और नाक कहते हैं उसकी नजर से आज भी यह विषय अछूता ही है। हां फिल्मों में वैष्याओं की समस्याओं और उनके बच्चों की समस्याओं पर जरूर काम हुआ है। पर, प्रिंट मीडिया और टेलीविजन की मीडिया में यदा कदा ही इनकी समस्याओं पर ख़बरें या चर्चा या विमर्ष आ पाती हैं। कितनी अजीब बात है कि समाज से बहिष्कृत ‘उनकी‘ संतानें मीडिया की नजर से भी महरूम हैं। क्या यह ‘उनकी‘ संतान होने की सजा है...?

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